शंकरा-त्रिताल
जय गणेश गणनाथ दयानिधि ।
सकल विघन कर दूर हमारे ॥
प्रथम धरे जो ध्यान तुम्हारे ।
तिसके पूरण कारज सारे ॥
लम्बोदर गजवदन मनोहर ।
कर त्रिशूल परशूवर धारे ॥
ऋद्धि सिद्धि दोउ चमर डुलावे ।
मूषकवाहन परम सुखारे ॥
ब्रह्मादिक सुर ध्यावत मनमे । ।
ऋषिमुनिगण सब दास तुम्हारे ॥
ब्रह्मानन्द सहाय करो नित ।
भक्त जनों के तुम रखवारे ॥